दिसंबर की शाम शुरू होने वाली थी.
गिन के तीन दिन बचे थे साल ख़त्म होने में. खबर आयी.
नॉएडा के छिजारसी गांव में एक महिला का मर्डर हुआ है. जाना पड़ेगा.
छिजारसी नॉएडा के रिहाइशी और औद्योगिक इलाकों के बाद आता है.
यहाँ सड़कें सिर्फ नाम मात्र की है और हवा में सिर्फ धूल मिट्टी
कार्बन और प्लास्टिक का धुआँ है. एक बेहद ही गंदे, लिबलिबे, काले हरे सीवर-नुमा तालाब के बीचो बीच 'टोटली एडजस्ट' होता हज़ारो लोगों का शहरी गांव.
हमें क्राइम स्पॉट ढूंढ़ने में काफी वक़्त लग गया. जिससे भी पूछते, जवाब मिलता, "अब क्यों आऐ हो भैय्या. पुलिस वाले तो चले गए."
काफ़ी देर बाद हमे वो गली मिल गयी जिसके आखिरी मकान में मर्डर हुआ था.
हमारे पहुचने से दो घंटे पहले ही पुलिस और मीडिया का जत्था निकल चुका था.
फ़िर भी उस मकान को घेरे 15 -20 लोगों की भीड़ खड़ी थी.
क्राइम स्पॉट मकान की पहली मंज़िल पर एक कमरे का घर था.
एक पच्चीस वर्ष की महिला की हत्या गला रेत कर दी गयी थी और नीचे बाज़ार खबरों औरअफवाहों से गर्म हुए जा रहा था.
बालकनी पर एक महिला शाल ओढ़े नीचे जुटी भीड़ को एकटक देख रही थी.
हमें बताया गया की ये महिला पीड़ित की परिजन है.
पुलिस पति को उठा कर ले गए है कानूनी कार्रवाई के लिए और फ़िलहाल वो महिला घर की चौकीदारी कर रही थी.
जो दो चार पत्रकार वहा खड़े हुए थे उन्होंने हमे केस समझाया और कहा की 'लव का एंगल है मर्डर में और ऐसा पड़ोसी कह रहे हैं.
आस पास खड़े लोगो ने भी हामी भरी और हमें बताया की 'औरत' का चक्कर चल रहा था किसी के साथ और शायद उसी इंसान ने हत्या की हैं.
मन में दो तीन सवाल सोच कर के हम भी सीढ़ियां चढ़ने लगे ऊपरी मंज़िल के लिए. देखा मोबाइल लिए दो रिपोर्टर अभी भी अपना 'वाक थ्रू' कर रहे है. यहाँ बता दे, पत्रकार बिरादरी जब भी कोई ऐसा केस कवर करती है जिसमे शामिल लोग गरीब तबके के होते है,
उनकी हिम्मत उतनी ही बढ़ जाती है.
किसी को हड़का कर पूछना, "ऐ कितना पैसा कमा लेते हो महीने का", "झूठ तो नहीं बोल रहे?" "घर में क्या क्या कीमती सामान था सब बताओ" वगैरह आसान हो जाता है. इन्ही पत्रकारों के सामने अगर योगी आदित्यनाथ साक्षात् प्रकट हो जाये तो वो उनके पांव छू ले.
ख़ैर तब तक हम कमरे तक पहुंच चुके थे. बाहर ताला जड़ा था.
हमें देख कर महिला ने कहा, "आपको नीचे खड़े लोगो ने तो बता ही दिया होगा. सभी कह रहे है की उसका चरित्र ख़राब था, मुँह पे बोलने की किसी की हिम्मत नहीं है. अगर चरित्र इतना ख़राब ही था तो कल तक क्यों हमारे मुँह लगते थे".
तभी उसने बालकनी से झुक कर नीचे चिल्ला कर कहा, "कौन बोल रहा है मेरी भांजी का चालचलन ख़राब था? सामने आओ और बता के दिखाओ. इधर ही काट देंगे."
गली में अचानक चुप्पी छा गयी. वही लोग जो दो मिनट पहले तक पीड़ित महिला की
कुंडली निकाल रहे थे अब धीरे धीरे अपने घरों की तरफ निकलने लगे.
हम भी अपना काम ख़त्म कर के वापिस अपनी बाइक के पास पहुंचे.
किक मारके पलट कर बालकनी की तरफ देखा तो वो महिला अभी भी वही खड़ी थी.
मुस्तैद.
उस वक़्त वो अपने परिवार का घर बचा रही थी जिसे हम उजाड़ने पर तुले हुऐ थे.
प्रख्यात नाटककार विलियम शेक्सपियर ने कहा हैं,
"पूरी दुनिया एक मंच है और हम बस किरदार."
शायद हम भी बस एक किरदार की तरह अपना काम कर के मंच से उतर रहे थे.
मंच पर बची थी तो बस वो महिला.
लाल, पथराई आँखों से शून्य की तरफ देखती हुई.
किसी शेक्सपियरन ट्रैजिक हीरो की तरह.
पर्दा गिरता है..
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